राउरकेला,18//5,(कलिंग समाचार): वर्तमान में राउरकेला इस्पात संयंत्र एक अत्यंत नाजुक और संकटपूर्ण दौर से गुजर रहा है। इस संबंध में राउरकेला श्रमिक संघ कार्यालय में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में इस्पात श्रमिक संघ के महासचिव प्रशांत बेहेरा ने पत्रकारों को जानकारी देते हुए कहा कि इस्पात संयंत्र की उत्पादन क्षमता को ४.५ मिलियन टन से बढ़ाकर ९.८ मिलियन टन करने के लक्ष्य के साथ विस्तारप्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसके लिए भूमि का चिन्हांकन, झुग्गी-झोपड़ियों को हटाना और झुग्गीवासियों के पुनर्वास की व्यवस्था युद्धस्तर पर चल रही है। राउरकेला श्रमिक संघ शुरू से ही इस विस्तार का समर्थन करता आ रहा है। विस्तार कार्य में तेजी लाने के लिए विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और मुख्यमंत्री को पत्र लिखने के साथ-साथ विभिन्न स्तरों पर चर्चा भी की गई है। राउरकेला श्रमिक संघ का दृढ़ विश्वास है कि राउरकेला शहर के सर्वांगीण विकास के लिए इस्पात संयंत्र का आधुनिकीकरण अत्यंत आवश्यक है।लेकिन दूसरी ओर, केंद्र सरकार, विशेष रूप से केंद्रीय इस्पात सचिव की श्रमिक विरोधी नीतियों ने राउरकेला इस्पात संयंत्र के कर्मचारियों के बीच गहरा डर पैदा कर दिया है। दिन-ब-दिन उत्पादन बढ़ रहा है, जबकि कर्मचारियों की संख्या लगातार घट रही है। परिणामस्वरूप, कर्मचारी असहनीय कार्यदबावके बीच काम करने को मजबूर हैं।वित्त वर्ष २०२५-२६ में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड द्वारा ४ हजार करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा कमाने की राह पर होने के बावजूद, कर्मचारियों को ३९ महीने का बकायानहीं दिया गया है। इसी तरह, ९ साल ६ महीने बीत जाने के बाद भी पूर्ण वेतन समझौता न होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। पिछले दो दशकों से इस्पात कर्मचारियों की प्रोत्साहनऔर पुरस्कार योजना में कोई बदलाव नहीं किया गया है। राउरकेला श्रमिक संघ द्वारा स्थानीय इस्पात अधिकारियों के साथ कई बार चर्चा कर अंतिम प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन वह अनुमोदन के नाम पर कॉर्पोरेट कार्यालय में लंबे समय से लंबित पड़ा है। ऐसी कई समस्याओं के बीच जब इस्पात कर्मचारी गुजर रहे हैं, तब इस्पात सचिव की मनमानी कार्यशैली कर्मचारियों के मनोबल को तोड़कर एक अप्रिय स्थिति की ओर ले जा रही है।इतिहास में पहली बार कोई इस्पात सचिव हर हफ्ते वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संयंत्र के मुख्य महाप्रबंधकों कार्यकारी निदेशकों और मुख्य प्रबंधकों के साथ चर्चा कर रहे हैं और एक निजी कंपनी की तरह श्रमिक विरोधी निर्णय लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं। स्थायी कर्मचारियों पर काम न करने का आरोप लगाकर उन्हें अपमानित करना और गेट पर अनावश्यक रूप से बायोमेट्रिक मशीनें लगाना, इसके उदाहरण हैं। विभिन्न कारणों से अनुपस्थिति का बहाना बनाकर कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की साजिश रचना, कर्मचारियों के असंतोष का मुख्य कारण बना हुआ है। इसके अलावा, टाउन इंजीनियरिंग जैसे कि इलेक्ट्रिकल, सिविल, वाटर सप्लाई विभाग, टाउन सर्विस, हॉर्टिकल्चर और आईजीएच – इस्पात जनरल अस्पताल) का निजीकरण करने का नीतिगत निर्णय लेकर उस दिशा में काम शुरू कर दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, आईजीएच के डॉक्टरों को नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है और विभिन्न बहाने बनाकर इन विभागों के कर्मचारियों और अधिकारियों का तबादला करके मानसिक दबाव बनाया जा रहा है, ऐसा आरोप राउरकेला श्रमिक संघ के महासचिव प्रशांत बेहेरा ने इस संवाददाता सम्मेलन में लगाया।आरआईएनएल का उदाहरण देते हुए पूरे सेल में ४० प्रतिशत स्थायी कर्मचारियों और ठेका श्रमिकों को कम करने का निर्देश दिया गया है। पहले स्थानीय अधिकारियों द्वारा सेवानिवृत्त कर्मचारियों को लाइसेंस पर मकान और विभिन्न संस्थानों को मकान आवंटित किए जाते थे, लेकिन अब ये सभी अधिकार इस्पात सचिव ने अपने नियंत्रण में ले लिए हैं। सैकड़ों अधिकारियों को दूसरे संयंत्रों में स्थानांतरित करने की योजना चल रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य दबाव बनाकर उन्हें नौकरी से बाहर करना है। श्री बेहेरा ने आरोप लगाया कि अब वीआर और सीआर लाने के साथ ही कर्मचारियों और अधिकारियों को नौकरी से निकालने का नीतिगत निर्णय लिया गया है। यहाँ तक कि कर्मचारी से अधिकारी बनने जा रहे ईओ कैडर के ५० प्रतिशत कर्मचारियों को भी दूसरे संयंत्रों में पोस्टिंग देने का नीतिगत निर्णय लिया गया है। राउरकेला श्रमिक संघ को उम्मीद थी कि संयंत्र के विस्तार से स्थानीय निवासियों और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, लेकिन वर्तमान में रोजगार सृजन के बजाय छंटनी का माहौल बनाया जा रहा है। इससे साफ है कि इस्पात सचिव राउरकेला इस्पात संयंत्र को निजी कंपनियों के हाथों में सौंपने के लिए एक तरह से जमीन तैयार कर रहे हैं।राउरकेला श्रमिक संघ ने आरोप लगाया है कि इस्पात मंत्री निष्क्रिय (स्थिर) हैं। संसद में जब इस्पात श्रमिकों के बारे में सवाल पूछा जाता है, तो मंत्री का जवाब आता है कि इसके लिए द्विपक्षीय मंच एनजेसीएस है, वहीं सब कुछ तय होगा। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि पिछले ढाई साल में एक भी बैठक नहीं बुलाई गई है। एमओयू के आधार पर पांच मुद्दों को उप-समितिके निर्णय पर छोड़ने के बाद, केवल वेतनमान और नाइट शिफ्ट भत्ते को आधार बनाकर बाकी बकाया और मकान किराया ) आदि को लटका कर रख दिया गया। यूनियनों की हड़ताल के बाद मुख्य श्रम आयुक्त के समक्ष दो बार हुए सुलह में भी प्रबंधन ने इस विषय पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया और विभिन्न बहानों से बचने की कोशिश कर रहा है।लेकिन सबसे खेदजनक बात यह है कि वेतन समझौते को ९ साल ६ महीने बीत जाने के बाद भी वास्तविक सच्चाई को सामने न लाकर, अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए यूनियनें केवल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में व्यस्त हैं, जिससे इस्पात मंत्रालय को और फायदा मिल रहा है। “मगरमच्छ खींचकर नदी के बीच ले आया है”, अगर हम अब भी नहीं जागे, तो “जब पानी सिर से ऊपर चला जाएगा” (नेड़ी गुड़ कहुणीकु बोहि गले) तब सब कुछ खत्म हो जाएगा। इसलिए अब संयंत्र, आईजीएच और टाउनशिप को बचाने के लिए संघर्ष का समय आ गया है, ऐसा आह्वान राउरकेला श्रमिक संघ के महासचिव ने सभी श्रमिक संगठनों से किया है।राउरकेला श्रमिक संघ बार-बार विरोध प्रदर्शनों और पत्रों के माध्यम से इसका विरोध करता आ रहा है। लेकिन अब सभी यूनियनों को एकजुट होकर लड़ना होगा। अन्यथा ऐसा समय आएगा जब न तो कोई यूनियन बचेगी और न ही कर्मचारियों की स्वतंत्रता। राउरकेला श्रमिक संघ ने पत्रकारों के माध्यम से सभी श्रमिक संगठनों को सूचित किया है कि इन सभी अन्यायों के खिलाफ आने वाले दिनों में आंदोलन को और तेज किया जाएगा और इस लड़ाई को एक निर्णायक मोड़ पर ले जाया जाएगा।

